UN में ट्रंप का धमाकेदार भाषण दुनिया को हिला देने वाला संदेश

ट्रंप का संयुक्त राष्ट्र भाषण 2025 – माइग्रेशन और क्लाइमेट पर हमला
ट्रंप ने UNGA 2025 में माइग्रेशन, क्लाइमेट और संयुक्त राष्ट्र पर बोला सीधा हमला

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का “Trump UN Speech” इस बार भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लाया. ट्रंप अपनी सीधी और आक्रामक शैली के लिए जाने जाते हैं और इस बार भी उन्होंने वही रंग दिखाया. बिना झिझक, बेबाक अंदाज़ और तीखे शब्दों ने उनके भाषण को खास बना दिया. यह भाषण केवल शब्दों का खेल नहीं था बल्कि इसमें वह आग और गुस्सा साफ झलक रहा था जो लंबे समय से उनके भीतर दुनिया की व्यवस्थाओं को लेकर जमा था. उनके अंदाज़ ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या उनकी यह सोच भविष्य में अमेरिका की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर गहरी छाप छोड़ेगी.

प्रवास पर सीधी चेतावनी

ट्रंप ने अपने भाषण की शुरुआत में ही प्रवास पर बहुत कड़ी बात कही. उन्होंने यूरोप को चेताया कि अगर उसने प्रवासियों को लेकर सख्त कदम नहीं उठाए तो वहां की संस्कृति और पहचान मिट जाएगी. उनके शब्दों में चिंता के साथ साथ चेतावनी भी साफ थी. उन्होंने कहा कि नरम रवैया अपनाने से केवल नुकसान होता है. अमेरिका ने अपनी सीमाओं को लेकर जिस तरह सख्त कदम उठाए वही तरीका बाकी देशों को भी अपनाना चाहिए. उनके मुताबिक अगर यह नहीं हुआ तो आने वाले समय में कई देश अपनी असली पहचान खो देंगे. ट्रंप का यह बयान कई लोगों को कठोर लगा लेकिन उनकी नजर में यह वास्तविकता का आईना था.

जलवायु परिवर्तन पर हमला

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ट्रंप ने दुनिया को चौकाने वाला बयान दिया. उन्होंने कहा कि यह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है. उनके मुताबिक ग्रीन एनर्जी नीतियों ने विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर कर दिया है. ट्रंप का कहना था कि प्रदूषण फैलाने वाले देश इस मुद्दे पर ढोंग कर रहे हैं और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा अमेरिका जैसे देशों को भुगतना पड़ा है. संयुक्त राष्ट्र और दूसरी संस्थाओं की भविष्यवाणियों को उन्होंने पूरी तरह गलत करार दिया. उनके तीखे शब्दों में यह पीड़ा साफ झलक रही थी कि कैसे जलवायु नीतियों की आड़ में अमेरिका को आर्थिक नुकसान सहना पड़ा. यह बयान सभा में बैठे कई लोगों के लिए असहज था लेकिन ट्रंप अपने अंदाज़ से पीछे हटने वाले नहीं थे.

रूस और ऊर्जा संकट पर निशाना

रूस और ऊर्जा संकट पर बोलते हुए ट्रंप ने सीधे यूरोप को कटघरे में खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा कि ऊर्जा के लिए रूस पर निर्भर रहना यूरोप की सबसे बड़ी गलती है. उन्होंने चेतावनी दी कि इस निर्भरता ने यूरोप को कमजोर कर दिया है और रूस को मजबूत. इतना ही नहीं उन्होंने चीन और भारत पर भी आरोप लगाया कि वे रूस को आर्थिक मदद देकर उसकी ताकत और बढ़ा रहे हैं. ट्रंप की बातों में गुस्सा और निराशा दोनों थे. उनके शब्द यह बता रहे थे कि अगर दुनिया ने ऊर्जा नीति पर सही फैसला नहीं लिया तो आने वाले समय में और बड़े संकट खड़े होंगे.

संयुक्त राष्ट्र पर तीखा हमला

संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर ट्रंप ने सबसे ज्यादा गुस्सा जताया. उन्होंने कहा कि यह संस्था केवल बयान देने में माहिर है लेकिन असली कदम नहीं उठाती. उनके मुताबिक जब असली फैसले की घड़ी आती है तो संयुक्त राष्ट्र केवल कागज़ों तक सीमित रह जाता है. ट्रंप ने याद दिलाया कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को दी जाने वाली अमेरिकी आर्थिक मदद कम कर दी क्योंकि उन्हें इसमें कोई ठोस नतीजा नहीं दिखा. उनके इस बयान ने सभा में बैठे कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया. उनकी नजर में संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं केवल दिखावे के लिए बनी हैं असली बदलाव के लिए नहीं.

नई बहस की शुरुआत

इस पूरे भाषण ने एक बार फिर साफ कर दिया कि ट्रंप बहुपक्षीय संस्थाओं पर भरोसा नहीं करते. उनकी नजर में अमेरिका के हित सबसे ऊपर हैं. उनके शब्दों ने संयुक्त राष्ट्र की अहमियत और वैश्विक सहयोग पर नई बहस छेड़ दी है. अब सवाल यह है कि क्या ट्रंप की यह आक्रामक शैली आने वाले समय में अमेरिका को और अलग थलग कर देगी या फिर यह मजबूती का नया रास्ता खोलेगी.

ट्रंप का यह भाषण केवल एक भाषण नहीं था बल्कि एक चुनौती थी संयुक्त राष्ट्र के लिए, यूरोप के लिए और पूरी दुनिया के लिए. यह चुनौती यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या मौजूदा वैश्विक व्यवस्था वास्तव में काम कर रही है या सिर्फ दिखावा है. ट्रंप की इस आवाज़ ने दुनिया को एक नई बहस के दरवाजे पर खड़ा कर दिया है.


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