$4300 तक पहुंची सोने की कीमत, दुनिया भर के सेंट्रल बैंक खरीद रहे गोल्ड!

$4300 तक पहुंची सोने की कीमत और सेंट्रल बैंकों की गोल्ड खरीदारी
गोल्ड प्राइस रिकॉर्ड स्तर पर, सेंट्रल बैंक कर रहे भारी गोल्ड खरीद

दुनिया की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. पहले जहां क्रूड ऑयल प्राइस को ग्लोबल इकॉनमी का मुख्य संकेतक माना जाता था, अब उसकी जगह गोल्ड ने ले ली है. 2025 में ज्यादातर इकोनॉमिस्ट और पॉलिसी मेकर्स अब तेल की नहीं, बल्कि सोने की कीमतों पर नज़र रख रहे हैं.

हाल के आंकड़ों के मुताबिक, गोल्ड प्राइस अब अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर पर है. एक औंस गोल्ड की कीमत $4300 तक पहुंच चुकी है, जो 2008 के बाद सबसे बड़ी तेजी मानी जा रही है. वहीं “गोल्ड टू ऑयल रेशियो” भी रिकॉर्ड 60 के पार चला गया है. यानी अब एक औंस सोने से 60 से ज्यादा बैरल क्रूड ऑयल खरीदा जा सकता है. यह रेशियो पहले 16 से 25 के बीच रहता था. इसका मतलब है कि सोने की मांग लगातार बढ़ रही है और तेल की कीमतें नीचे जा रही हैं.


सेंट्रल बैंकों का भरोसा अब डॉलर से ज्यादा गोल्ड पर

दुनिया भर के सेंट्रल बैंक अब डॉलर और यूरो की जगह गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि अब ग्लोबल फॉरेक्स रिजर्व में 46% हिस्सा डॉलर का है, जबकि 20% हिस्सा गोल्ड का और सिर्फ 16% यूरो का रह गया है. भारत, चीन, मिडिल ईस्ट और यूरोप की सेंट्रल बैंकें लगातार गोल्ड खरीद रही हैं ताकि अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत और स्थिर रख सकें. यह ट्रेंड दिखाता है कि निवेशक और नीति निर्माता दोनों अब सोने को “सुरक्षित निवेश (Safe Haven Asset)” के रूप में देख रहे हैं.

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गोल्ड बना Safe Haven, निवेशकों का बढ़ा भरोसा

गोल्ड हमेशा से सुरक्षित निवेश का प्रतीक रहा है, लेकिन अब यह भूमिका और मजबूत हो गई है. जब भी दुनिया में जियोपॉलिटिकल टेंशन, युद्ध या आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, लोग गोल्ड खरीदने की ओर झुकते हैं.

2025 में अमेरिका की आर्थिक नीतियों में अस्थिरता, डॉलर की कमजोरी और घटती Real Interest Rate ने भी गोल्ड की चमक बढ़ा दी है. जब ब्याज दरें वास्तविक रूप से कम होती हैं और महंगाई बढ़ती है, तो निवेशकों को बैंक डिपॉजिट से फायदा नहीं होता. ऐसे में गोल्ड एक भरोसेमंद विकल्प बन जाता है. यही वजह है कि आज दुनिया के छोटे-बड़े इन्वेस्टर्स गोल्ड में पैसा लगा रहे हैं, जिससे इसका दाम लगातार बढ़ रहा है.


क्रूड ऑयल का रोल हुआ कम, अब नहीं बताता आर्थिक डर

पहले क्रूड ऑयल को अर्थव्यवस्था का थर्मामीटर माना जाता था. तेल की बढ़ती कीमतें विकास का संकेत देती थीं, जबकि घटती कीमतें मंदी का डर दिखाती थीं. लेकिन अब यह स्थिति बदल चुकी है.

आज ऑयल की कीमतें मुख्य रूप से Economic Growth से जुड़ी मानी जाती हैं, न कि किसी डर या संकट से. इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं  एक, दुनिया अब तेजी से Renewable Energy की ओर बढ़ रही है, 

और दूसरी, OPEC Plus देश तेल उत्पादन को जरूरत के हिसाब से नियंत्रित कर रहे हैं. इससे बाजार में ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव कम हो गया है. इसलिए जब दुनिया में चिंता या मंदी का माहौल बनता है, तो ऑयल नहीं बल्कि गोल्ड तेजी दिखाता है.

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आगे क्या? गोल्ड टू ऑयल रेशियो से समझिए भविष्य

इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि “Gold to Oil Ratio” लंबे समय तक 60 के ऊपर नहीं रहेगा. आने वाले समय में या तो गोल्ड की कीमतों में गिरावट आएगी या ऑयल की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे यह रेशियो फिर सामान्य स्तर (18–25) पर लौट सकता है.

हालांकि फिलहाल दुनिया के Investors और Central Banks दोनों का झुकाव गोल्ड की ओर है. भारत जैसे देशों में भी गोल्ड रिजर्व लगातार बढ़ाया जा रहा है.

आज की तारीख में गोल्ड सिर्फ एक कीमती धातु नहीं रहा. यह अब दुनिया की ग्लोबल इकॉनमी का नया संकेतक बन चुका है. जहां कभी क्रूड ऑयल से अर्थव्यवस्था की सेहत को मापा जाता था, वहीं अब सोना दुनिया की आर्थिक नब्ज को सबसे सटीक तरीके से दिखा रहा है.

निवेशकों, सेंट्रल बैंकों और नीतिनिर्माताओं की नजरें अब गोल्ड के ग्राफ पर हैं. साफ है कि आने वाले वर्षों में गोल्ड ही तय करेगा कि ग्लोबल मार्केट किस दिशा में बढ़ रहा है.

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