जब पूरे देश में बुझ जाती हैं दीये, तब भी चमकता है उत्तराखंड!

उत्तराखंड में दिवाली के दौरान जलते दीये
पहाड़ियों में दिवाली के दीये और भैलो की रोशनी (AI Generated)


देशभर में जब दीपावली की रोशनी धीरे धीरे बुझने लगती है, तब भी उत्तराखंड की पहाड़ियां दीयों से चमकती रहती हैं. यहां दीपावली एक दिन नहीं, बल्कि कई बार मनाई जाती है. हर क्षेत्र में इसे अलग नाम और परंपराओं के साथ मनाया जाता है  इगास बगवाल, बूढ़ी दिवाली और मंगशीर दिवाली. यही वजह है कि उत्तराखंड की दिवाली बाकी देश से खास और अलग दिखती है.


इगास बगवाल भगवान राम की खबर से जुड़ी परंपरा

कहा जाता है कि जब भगवान श्रीराम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे, तो उनकी खबर पहाड़ों की घाटियों तक पहुंचने में कुछ दिन लग गए. जहां जहां यह खबर पहुंची, वहां के लोगों ने उसी दिन दीपावली मनाई. तभी से यह परंपरा चली और आज भी दिवाली के 11 दिन बाद इगास बगवाल  मनाई जाती है.

गढ़वाल क्षेत्र में इस दिन बहुत उत्साह रहता है. शाम को लोग देवदार की टहनियों से मशालें बनाते हैं, जिन्हें भैलो कहा जाता है. बच्चे और बुजुर्ग सब मिलकर गोल घेरा बनाते हैं, मशालें घुमाते हैं और “भैलो रे भैलो” गाते हुए नाचते हैं. इस दिन गाय-भैंसों को नहलाया जाता है, उनके सींगों में तेल लगाया जाता है और उन्हें स्वादिष्ट खाना दिया जाता है.

गढ़वाल की एक मान्यता वीर माधव सिंह भंडारी से भी जुड़ी है. कहा जाता है कि वे युद्ध में गए थे और दिवाली के समय घर नहीं लौट पाए. जब वे 11 दिन बाद विजय पाकर लौटे, तब पूरे इलाके में दीप जलाकर दिवाली मनाई गई. तब से इगास बगवाल वीरता और खुशी का प्रतीक बन गई.


कुमाऊं में तीन बार मनाई जाती है दिवाली

कुमाऊं क्षेत्र की दिवाली भी बहुत अनोखी होती है. यहां दिवाली तीन बार मनाई जाती है कोजागर, महालक्ष्मी, और बूढ़ी दिवाली.

बूढ़ी दिवाली के दिन घरों में सूपों पर एपन बनाकर बाहर रखा जाता है. माना जाता है कि ऐसा करने से गरीबी और दुख दूर होते हैं. आंगन में तुलसी के पास और ओखल के पास दीप जलाए जाते हैं. इस दिन पशुओं की भी पूजा की जाती है और घर दीपों से भर जाते हैं.


मंगशीर दिवाली जौनसार की सबसे खास परंपरा

उत्तराखंड के जौनसार-बावर इलाके में दिवाली एक महीने बाद मंगशीर दिवाली के रूप में मनाई जाती है. इस दिन लोग पंचायत भवन में अपने इष्ट देवता के नाम के अखरोट जमा करते हैं. बाद में मुखिया इन्हें आंगन में फैलाकर सबको प्रसाद के रूप में बांटता है.

यहां पुरुष और महिलाएं पारंपरिक कपड़े पहनकर गीत गाते हैं और लोक नृत्य करते हैं  जैसे हारुल, रासो और नाटी. जौनसार की दिवाली में लोग शहरों में नहीं, बल्कि अपने गांव लौटकर पूरे परिवार के साथ त्योहार मनाते हैं. इस मौके पर मेहमानों को चिवड़ा, मुंडी और अखरोट देने की खास परंपरा है.


इतिहास और आस्था से जुड़ा पर्व

माना जाता है कि मंगशीर दिवाली की शुरुआत 17वीं सदी में हुई थी. उस समय गढ़वाल नरेश महिपत शाह के शासन में वीर माधव सिंह भंडारी तिब्बत युद्ध में गए थे. वे कार्तिक अमावस्या की दिवाली पर घर नहीं लौट पाए थे. जब वे एक महीने बाद जीतकर लौटे, तब पूरे गांव ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया. तभी से मंगशीर दिवाली मनाने की परंपरा शुरू हुई.

उत्तराखंड की दिवाली सिर्फ दीयों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और लोकसंस्कृति का प्रतीक है. यहां हर घाटी, हर गांव और हर घर की अपनी दिवाली है, जो पहाड़ों की पहचान और गर्व का हिस्सा बन चुकी है.

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