अमेरिकी संसद में एच-1बी और एल-1 वीज़ा को लेकर फिर से कड़ा रुख देखने को मिल रहा है. तीन सीनेटरों ने नए बिल पेश किए हैं, जिनका मकसद वीज़ा सिस्टम में मौजूद loopholes को बंद करना है. इन बदलावों का असर भारत और चीन से आने वाले टेक और रिसर्च सेक्टर के कर्मचारियों पर सबसे ज्यादा पड़ेगा.
नए बिल में कंपनियों के लिए भर्ती और वेतन नियम सख्त करने का प्रस्ताव है. नौकरी की जानकारी सार्वजनिक करना और वीज़ा पाने की शर्तें सीमित करना भी शामिल है. रिपब्लिकन सीनेटर चक ग्रासली ने कहा कि अब कई कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकालकर सस्ते विदेशी वर्कर्स रख रही हैं. डेमोक्रेटिक नेता डिक डर्बिन ने बताया कि बड़ी कंपनियां पहले हजारों अमेरिकी कर्मचारियों को निकाल देती हैं और फिर कम सैलरी पर विदेशी कर्मचारियों के लिए वीज़ा मांगती हैं. उनका कहना है कि अमेरिकी कर्मचारियों को बचाना अब जरूरी है.
यूनिवर्सिटी और नॉन-प्रॉफिट्स पर असर
अर्कांसस के रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन ने अलग बिल पेश किया है. इसमें यूनिवर्सिटीज़, रिसर्च सेंटर और नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं को अनलिमिटेड विदेशी स्टाफ रखने की छूट खत्म करने का प्रस्ताव है. कॉटन का कहना है कि कुछ संस्थाएं इस छूट का गलत इस्तेमाल कर रही हैं. कई प्रोफेसर ऐसे हैं जो अमेरिका के खिलाफ सोच रखते हैं. नया कानून इन loopholes को रोकने में मदद करेगा.
एल-1 वीज़ा कंपनियों को अपने विदेशी दफ्तरों से स्टाफ अमेरिका लाने की अनुमति देता है. वहीं, एच-1बी वीज़ा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल अमेरिकी टेक कंपनियां करती हैं, खासकर भारत और चीन से टैलेंट लाने के लिए.
ट्रंप प्रशासन के फैसले और नई फीस
पिछले महीने ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीज़ा की फीस बढ़ाकर 215 डॉलर से 1,00,000 डॉलर कर दी है. इसके साथ ही लॉटरी सिस्टम हटाकर “वेटेड सिलेक्शन प्रोसेस” लागू करने का प्रस्ताव है. इसमें कर्मचारी की सैलरी के आधार पर वीज़ा मिलने की संभावना तय होगी. उदाहरण के लिए, जिनकी सालाना कमाई 1,62,528 डॉलर है, उन्हें चार मौके मिलेंगे. वहीं कम सैलरी वाले कर्मचारियों को सिर्फ एक मौका मिलेगा. सरकार का कहना है कि इससे हाई स्किल और हाई सैलरी वाले कर्मचारियों को प्राथमिकता मिलेगी.
भारतीय प्रोफेशनल्स और भविष्य
भारत से हर साल हजारों आईटी प्रोफेशनल्स अमेरिका जाते हैं. बढ़ी हुई फीस और नए नियम उनकी राह और मुश्किल बना सकते हैं. आईटी कंपनियों के लिए यह खर्च बढ़ने जैसा है और युवा प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका में करियर बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
अगर ये बिल पास हो गए, तो भारतीय कंपनियों को अपने प्रोजेक्ट्स भारत में ही पूरा करना होगा. इससे अमेरिका में भारतीय वर्कर्स की संख्या कम हो सकती है. आने वाले महीनों में कांग्रेस में इन बिलों पर फैसला तय करेगा कि भारतीय और दूसरे विदेशी कर्मचारियों के लिए अमेरिका में काम करना आसान रहेगा या मुश्किल.
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